(तर्ज : गजल ताल तीन )
अक्सर प्रभू हमारा,
सब काम कर रहा है ॥टेक॥
हम तो बने है अंधे, ईश्वरके आसरेमें ।
सब वहही कर रहा है, सब वहही भर रहा है ॥१॥
सृष्टी वही चलाता, मुरदोंको वह खिलाता ।
उसकाही खेल सारा, वहही हरा रहा है ॥२॥
उसने खुदी बनाया, कूटस्थ साथ लेकर ।
कर्ता सभी जगतका, सबमें समा रहा है ॥३॥
आधार है उसीको, निज रूप मूल जिसका ।
तुकड्या उसे लगा है, सब और खो रहा है ॥४॥