(तर्ज : अगर है शौक मिलनेका...)
अगर भवपार होना है,
किसीभी पंथको धरले ॥टेक॥
हजारो मार्ग है भाई ! सभी सच पाने बनवाई ।
इन्हें क्या मिल गया साई? खबर इस बातकी करले ॥१॥
पंथ वह एक है पैदा, उसीके पार सब कैदा ।
खडा उसमें गुरु बैदा, दवा लो जन्मको हरले ॥२॥
किसे वह पंथ है कहना ? सदा अलमस्त धुन रहना ।
प्रभूमें जानसे बहना, यही कर फेर भव तरले ॥३॥
सही जो पंथ वह तोडा, नचाया काठका घोडा ।
कहे तुकड्या गुरु छोड़ा, उसीका नाम दिल भरले ॥४॥