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अँखियाँ प्रेमनकी भूखी हैं

(तर्ज : नैनन में बस जा गिरिधारी...)

अँखियाँ प्रेमनकी भूखी हैं टेक

तडप रही यह जान कलहमें, 
शांति बिना दरसन हूकी है 

कब पाओ कब पाओ जियको ? 
नींद न आय, जिंहा सूखी है 

जिधर-उधर मेरे श्यामकी तारी, 
देखनको मनुवा झूकी है 

तुकड्यादास कहे मिल प्यारे ! 
माफ किया करके चूकी है