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कलीने सबका मत मारा

(तर्ज : जमका अजब तडाका बे...)

कलीने सबका मत मारा, पुराना शास्त्र पंथ हारा ॥टेक॥

नीति धर्मको मानत झूठा, एक किया सारा ।
जीव-जंतु को कौन खिलावे, नहि डाले चारा ॥१॥

एक कहे सब पुराण झूठे, दूजा मत न्यारा ।
एक कहे सब वही भरा हैं, देखत परनारा ॥२॥

द्वार भिखारी आया उसको बातनसे मारा ।
रोटि न उसको देत, मरे वह देखे मत प्यारा ॥३॥

कहता तुकड्या नरक न चूके,जबतक दुहि धारा ।
जानत होके एकहि बोले, जमके मुख जोरा ॥४॥