अजि ! दो दर्शन महाराज !
आज चरणोंमे आया हूँ ॥टेक॥
लख चौरासी भटकावत, यह नरतन पाया हूँ ।
अब कुछ लाज रखो मेरी, भवसे पछताया हूँ ॥१॥
भव - सागर यह दुस्तर, जरसे जात बहाया हूँ ।
जम -डंडा सोसे नहिं अब, यह अरजी लाया हूँ ॥२॥
मायारूप विषयनके माँही, जाय समाया हूँ ।
सुंदर काया बीत रही, नहिं काज कमाया हूँ ॥३॥
दया करो प्रभुराज ! आजतक सीस नमाया हूँ ।
तुकड्यादास दरसबिन सारा, काम भुललाया हूँ ॥४॥