(तर्ज : अंजि मोरि लाज रखो...)
अचरज नाथ ! गजबका पाया ।
देख दरस मन भाया ॥टेक॥
मोरमुकुट कुंडल काननमों,
करमों बंसि उठायो ॥१॥
कटि पीतांबर कसा दुशाला,
गल बनमाल सुहाया ॥२॥
बान कसी भौंहोकी छबियॉ,
लॉल गाल बहराया ॥३॥
तुकड्यादास कहे मैं देखा,
मन-मंदीर बिठाया ॥४॥