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अजब हैरान हूँ भगवन्‌ !

(तर्ज : अगर है शौक मिलने का...)
 
अजब हैरान हूँ भगवन्‌ ! पार कैसे लगाओगे ?
पड़ा भवधारके माँही, भरमसे कब जगाओगे ? टेक
 
न मुझको आसरा कोई, न बाहो तैरनेको है ।
बढाकर ग्यान - शक्तिको, भजनमें कब रंगाओगे ? ॥१
 
पड़ा हूँ फाँस-विषयोंमे, झूठ जंजालके माँही ।
बताकर आँखको अपनी, नयन ये कब जगाओगे ? ॥२
 
ने हमको ग्यान मालूम है, न भक्ती-भाव वह तेरा ।
ऐ भोले ! नर्क - कष्टोंसे, जीव यह कब भगाओगे ? ॥३
 
भरोसा है नही कोई, तुम्हारे नाम-जागर बिन 
वह तुकड्या फिर रहा भारी, चरणपे कब समाओगे ? ॥४