अजब हैरान हूँ भगवन् ! पार कैसे लगाओगे ?
पड़ा भवधारके माँही, भरमसे कब जगाओगे ? ॥टेक॥
न मुझको आसरा कोई, न बाहो तैरनेको है ।
बढाकर ग्यान - शक्तिको, भजनमें कब रंगाओगे ? ॥१॥
पड़ा हूँ फाँस-विषयोंमे, झूठ जंजालके माँही ।
बताकर आँखको अपनी, नयन ये कब जगाओगे ? ॥२॥
ने हमको ग्यान मालूम है, न भक्ती-भाव वह तेरा ।
ऐ भोले ! नर्क - कष्टोंसे, जीव यह कब भगाओगे ? ॥३॥
भरोसा है नही कोई, तुम्हारे नाम-जागर बिन ।
वह तुकड्या फिर रहा भारी, चरणपे कब समाओगे ? ॥४॥