अजब है ये बातें, अजब है बतैया ।
गजब की है सूरत,गजब की है मैय्या ॥टेक॥
सभी कुछभि दिखता, न वो जान पाती ।
आओ रहती है सबमें, नजरमें न आती ॥
सिरफ जानता हूँ,उसे मैं हि भैय्या ! ॥१॥
मुझे ही बनाकर नचाती है सारा ।
रुलाती - हँसाती मचाती पसारा ॥
न मैं भूलता हूँ, इसकी छलैया ॥२॥
पलक में अमीरी, पलक में फकिरी ।
पलक में समुंदर, पलक बैठी मंदर ॥
नही कुछ ठिकाना,कहाँ इसकी नैया ! ॥३॥
इसे मैने जाना, पुरा ही पछाना ।
ये मेरा तरंग है, मेरा ही बहाना ॥
कहे दास तुकड्या, मैं साक्षी खिलैया ॥४॥