अजब संसार का परदा, ढँका है खूब सूरत में ।
बनायी कइ तरह रंगकी, भेद हर एक मूरत में ॥टेक॥
न तेरा पार है किसको , जो तू आधार है किसको ? ।
मिली है राह यह जिसको, न जाता फिर वह तीरथ में ॥१॥
कही मजनू बना तू है , कहीं लैला बना है तू ।
कहीं तो बादशाह बनके, फकीरी लेत तूरतमें ॥२॥
कहीं तो नौकरी करता, अमीरी भी कहीं धरता ।
खुदी करता खुदी हरता, बनाकर देह हुजरतमें ॥३॥
बनाता एकसे लाखो, कटाता लाख भी पलमें ।
वह तुकड्यादास कहता हे, जो जाने वह रहे मतमें ॥४॥