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अजब संसार का परदा

(तर्ज : अगर है शौक मिलने का...)
 
अजब संसार का परदा, ढँका है खूब सूरत में ।
बनायी कइ तरह रंगकी, भेद हर एक मूरत में टेक
 
न तेरा पार है किसको , जो तू आधार है किसको ? ।
मिली है राह यह जिसको, न जाता फिर वह तीरथ में ॥१
 
कही मजनू बना तू है , कहीं लैला बना है तू ।
कहीं तो बादशाह बनके, फकीरी लेत तूरतमें ॥२
 
कहीं तो नौकरी करता, अमीरी भी कहीं धरता ।
खुदी करता खुदी हरता, बनाकर देह हुजरतमें ॥३
 
बनाता एकसे लाखो, कटाता लाख भी पलमें ।
वह तुकड्यादास कहता हे, जो जाने वह रहे मतमें ॥४